बुधवार, 11 अगस्त 2010

स्वतंत्रता दिवस पर मुद्दे ( १ ) : क्या भारत के प्रधानमंत्री का पद प्रशासनिक है या राजनैतिक ?


प्रश्न इसलिए कि जब श्री मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने तो यह व्यवस्था बतायी गयी कि सोनिया जी यूपीए की अध्यक्ष के रूप मे पोलिटिकल मैनेजमेंट करेंगी और प्रधान मंत्री प्रशासनिक मैनेजमेंट करेंगे । उस समय कुछ सवाल जरूर उठे थे लेकिन तब के भावुकता भरे माहौल मे इस पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ । लेकिन अब जब कि यूपीए का दूसरा कार्यकाल शुरू हुए भी एक साल से ज्यादा हो गये हैं तो इस प्रश्न पर पूरी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए ।

प्रधानमंत्री का पद तो नितांत राजनैतिक मैनेजमेंट के लिए ही है , प्रशासनिक व्यवस्था के मैनेजमेंट के लिए तो कैबिनेट सेक्रेटरी होते हैं । दूसरी बात सरकार के मुखिया के तौर पर प्रधान मंत्री को सरकार के कार्यों के आधार पर अपनी पार्टी को चुनाव मे जनता के सामने भी ले जाना होता है और जवाब देना होता है । यह सरकार दुबारा चुन कर आयी है और कांग्रेस ज्यादा सीटों से जीत कर भी आयी है, लेकिन कहीं न कहीं जिस नैतिक उच्च मानदंड के साथ इस सरकार को राजनैतिक पहल करनी चाहिए थी वह दिखायी नही दे रहा है । जहां कहीं भी जिस निर्णायक राजनैतिक पहल की जरूरत है वहां पर यह सरकार बगलें झाकंते नजर आ रही है । चाहे नक्सलवाद का मामला हो , तेलंगाना का मामला हो , पाकिस्तान से संबंध का मामला हो, बलूचिस्तान मे भारत के गड़बड़ी फैलाने को लेकर पाकिस्तान का आरोप हो या कश्मीर का मामला हो । हर जगह यही नजर आ रहा है कि या तो केवल बात को टाला जा रहा है या बात बिगड़ रही है । वह पहल नही नजर आ रही जिसकी उम्मीद थी ।

प्रधान मंत्री भले ही एक राजनैतिक दल से चुना जाता हो परन्तु वह देश का मुखिया होता है । उसका व्यवहार स्टेट्समैन का होता है , उसे दूर द्रष्टा होना चाहिए । आज इन बातों का अभाव दिख रहा है । क्या इसका कारण यह है कि प्रधानमंत्री जो कि राज्यसभा से हैं और उन्होने कभी भी लोकसभा का चुनाव नहीं जीता है ऐसे मे वह नैतिक बल नहीं जुटा पा रहे हैं जो कि इसके पहले के प्रधानमंत्री कर सकते थे जैसे इन्दिरा जी , राजीव जी या फिर नरसिंहाराव जी और वाजपेयी जी हों । जब कि गंभीर और दूरगामी प्रभाव वाले मसले पर जब राजनीतिक आम सहमति बनानी होती है तो प्रधानमंत्री जी को स्वयं के बजाय सोनिया जी पर निर्भर रहना पड़ता है । इसलिए उन्हे पहले वहीं पर ही जूझना पड़ता है । यह बात हम सब न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर देख चुके हैं जब प्रधानमंत्री को इस्तीफे की धमकी तक देनी पड़ी थी , तब कहीं जा कर उन्हे पार्टी का समर्थन मिला था । ऐसे मे यह तो जाहिर है कि इस तरह की धमकी कितनी बार दी जा सकती है । इसलिए ज्यादातर मसलों पर कोई निर्णायक पहल के बजाय किसी तरह टाइम काटने वाला रवैया ज्यादा लग रहा है ।


इन हालातों मे क्या यह उचित नहीं होगा कि देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिले जो राजनैतिक हो , राजनैतिक मैनेजमेंट भी करे और स्टेट्समैन की तरह राजनैतिक इनीसियेटिव ले ।


( १५ अगस्त आने वाला है इस अवसर पर कुछ मुद्दे जिन पर हमे निरपेक्ष भाव से विचार करना चाहिए - इसी श्रंखला में पहला लेख )

1 टिप्पणी:

  1. इन हालातों मे क्या यह उचित नहीं होगा कि देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिले जो राजनैतिक हो , राजनैतिक मैनेजमेंट भी करे और स्टेट्समैन की तरह राजनैतिक इनीसियेटिव ले ।

    sehmat hun aapse !

    zealzen.blogspot.com

    ZEAL

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